श्री गणेश जी की आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा !
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा!! जय!
एकदंत दयावन्त चार भुजा धारी!
मस्तक सिन्दूर सोहे मूसे की सवारी!! जय!
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा!.
लडडूवन का भोग लगे संत करे सेवा!! जय!
अन्धन को आंख देत कोढ़ीन को क्या!
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया!! जय!
गोरी के पुत आप रिद्धि सिद्धि संग सजे!
गावत गुण तानसेन दुःख दरिद्र भाजे!!
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा!
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा!!
श्री गणपतिजी की आरती
गणपतीजी की सेवा मंगल मेवा सेवा से अब बिघन टरे |
तीन लोक तैतीस देवता, द्वार खड़े सब अरज करें ||
रिद्धि सिद्धि दछिण वाम विराजे,आनवान सो चमर करें |
धूप दीप और लिये आरती,भक्त खड़े जयकार करें || गण.
गुण के मोदक लगत हैं,मूषक वाहन चढ़ा करें |
सौम्य रूप सेवा गणपति की विघ्न भाग जा दूर पड़े || गण.
भादो मास आरु शुक्ल चतुर्थी,दिन दोपहरा पुर पड़े |
लियो जन्म गणपति प्रभुजी ने, दुर्गा मन आनन्द भरें || गण.
अद्भूत बजा बाज्या इन्द्र का,देववधू जहां गान करे |
श्री शंकर के आनंद उपज्यो नाम सुन्या सब विघन टरे ||गण.
आन विधाता बैठे आसन, इंद्र अप्सरा नृत्य करें |
देख वेद ब्रम्हाजी जाको विघ्न विनायक नाम धरे || गण
एकदन्त गजबदन विनायक त्रिनयन रूप अनूप धरे|
पग खम्हा सा उदर पुष्ट है देख चन्द्रमा हास्य करें ||
दे श्राप श्री चंद्रदेव को कलाहीन तत्काल करें |
चौदह लोक में फिर गणपति,तीन भुवन में राज्य करें || गण.
उठ प्रभात जब करें ध्यान कोई वाके कारज सबै सरे |
पूजा काल जो गावे आरती, वके सर यस छत्र फिरे ||गण.
गणपति जी की पूजा करने से काम सभी निर्विघन सरे|
श्री प्रताप गणपति जी को,हाथ जोड़ अरज करें |
गणपति की सेवा मंगल मेवा, सेवा से सब विघ्न टरे..
